. अंगुलिमाल और बुद्ध: घृणा पर करुणा की विजय
मगज के जंगलों में एक खूंखार डाकू रहता था जिसका नाम था अंगुलिमाल। उसने प्रण लिया था कि वह एक हजार लोगों की हत्या करेगा और उनकी अंगुलियों की माला पहनेगा। उसके डर से राजा प्रसेनजित की सेना भी कांपती थी।
एक दिन भगवान बुद्ध उस जंगल की ओर चल दिए। लोगों ने उन्हें रोका, पर वे मंद-मंद मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए। जब अंगुलिमाल ने बुद्ध को देखा, तो वह हाथ में तलवार लेकर उनके पीछे दौड़ा। लेकिन बुद्ध शांत भाव से चलते रहे। अंगुलिमाल चिल्लाया, “रुक जा सन्यासी!”
बुद्ध रुके और शांति से बोले, “मैं तो रुक गया, पर तुम कब रुकोगे? तुम यह हिंसा कब बंद करोगे?” बुद्ध की आँखों में डर के बजाय अपार करुणा देखकर अंगुलिमाल का हृदय कांप उठा। बुद्ध ने उसे एक पेड़ की टहनी तोड़ने और फिर उसे वापस जोड़ने को कहा। जब वह नहीं जोड़ पाया, तो बुद्ध ने समझाया—”जो तुम जोड़ नहीं सकते, उसे तोड़ने का हक तुम्हें किसने दिया?”
अंगुलिमाल बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। वह डाकू से एक भिक्षु बन गया। यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवर्तन संभव है, और हमारा मंदिर भी ऐसे ही भटकते हुए मन को शांति का मार्ग दिखाने के लिए बनाया जा रहा है।

