भगवान बुद्ध मंदिर निर्माण समिति ट्रस्ट

हमारा संकल्प: बुद्ध की धरती पर धर्म  का पुनरुद्धार

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वास्तुकला: परंपरा और आधुनिकता का संगम

सांची स्तूप और अजंता की गुफाओं से प्रेरित, भगवान बुद्धा मंदिर निर्माण समिति ट्रस्ट में पारंपरिक भारतीय शिल्प कौशल का उपयोग किया जाएगा। * मुख्य गर्भगृह: यहाँ भगवान बुद्ध की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी, जिसे मकराना मार्बल (संगमरमर) से तराशा जाएगा। * अशोक स्तंभ की प्रतिकृति: मंदिर के प्रवेश द्वार पर भारत के धम्म शासन का प्रतीक 'अशोक स्तंभ' स्थापित होगा। * विपश्यना ध्यान कक्ष: एक ध्वनि-मुक्त (sound-proof) भूमिगत हॉल, जहाँ 500 साधक एक साथ बैठकर मौन साधना कर सकेंगे। * पर्यावरण के अनुकूल परिसर: हम प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन सुनिश्चित करने के लिए वास्तु शास्त्र का उपयोग कर रहे हैं।

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'दान' की महिमा: पुण्य कर्म का संचय आपके योगदान का महत्व

हमारी संस्कृति में 'दान' को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। मंदिर निर्माण में सहयोग करना "शाश्वत दान" माना जाता है—एक ऐसा उपहार जो सदियों तक फल देता रहता है। जब तक इस मंदिर में कोई व्यक्ति शांति प्राप्त करेगा या कोई बच्चा शिक्षा लेगा, उस पुण्य का फल दानदाताओं और उनके परिवारों को मिलता रहेगा।

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आयकर में छूट:

सभी दान आयकर अधिनियम की धारा 80G के तहत कर कटौती के पात्र हैं। हम अपने अनिवासी भारतीय (NRI) भाइयों और बहनों के लिए FCRA-अनुपालन चैनल भी प्रदान करते हैं।

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दान श्रेणियाँ (योगदान राशि)

* धम्म ज्योति (₹5,001): एक पवित्र ईंट की स्थापना और आपके परिवार के नाम पर प्रार्थना। * बोधि वृक्ष संरक्षक (₹21,000): मंदिर के बगीचों और वृक्षों के रखरखाव में सहयोग। * संघ मित्र (₹51,000): मुख्य प्रांगण में "आभार दीवार" पर आपका नाम अंकित किया जाएगा। * विहार ट्रस्टी (₹5,00,000+): मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक समर्पित मार्बल पट्टिका पर स्थायी पहचान।

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पारदर्शिता और विश्वास (सुशासन)

हम आपके पसीने की कमाई का सम्मान करते हैं। हमारा ट्रस्ट, [ट्रस्ट का नाम], सख्त वित्तीय अनुशासन बनाए रखता है: * डिजिटल ट्रैकिंग: दान के तुरंत बाद व्हाट्सएप पर रसीद प्राप्त करें। * मासिक ऑडिट: सभी खर्चों का ऑडिट चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) द्वारा किया जाता है और वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाता है। * सीधा प्रसारण (Live View): हमारी वेबसाइट के लाइव-स्ट्रीम कैमरे के माध्यम से 24/7 निर्माण कार्य देखें।

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इस मंदिर की आवश्यकता क्यों?

* आध्यात्मिक शिक्षा: दैनिक वंदना और ध्यान के लिए एक शांत स्थान। * सांस्कृतिक संरक्षण: भारतीय बौद्ध कला और मूर्तिकला का प्रदर्शन। * समाज सेवा: एक मुफ्त क्लिनिक और 'अक्षय पात्र' शैली की सामुदायिक रसोई (भोजनालय)।

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भगवान बुद्ध की महायात्रा

सिद्धार्थ से तथागत तकभगवान बुद्ध की जीवन यात्रा किसी साधारण मनुष्य की कहानी नहीं है, बल्कि यह अज्ञानता के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का मार्ग है। इस यात्रा को समझने के लिए हमें ढाई हजार साल पीछे उस कालखंड में जाना होगा, जब सत्य की खोज महलों के सुख-सुविधाओं से अधिक मूल्यवान हो गई थी।🏔️ 1. लुंबिनी: करुणा का जन्म (जन्म और बाल्यकाल)ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी में, हिमालय की तराई में स्थित शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु के पास लुंबिनी के उद्यानों में राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ। राजा शुद्धोधन और रानी महामाया के पुत्र सिद्धार्थ का जन्म एक दैवीय घटना माना जाता है। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक या तो एक महान ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बनेगा या एक ‘महान सन्यासी’।सिद्धार्थ का बचपन सुख-सुविधाओं के बीच बीता, लेकिन उनका मन सदा गहन चिंतन में डूबा रहता था। उनके पिता ने उन्हें सांसारिक दुखों से दूर रखने के लिए तीन ऋतुओं के अनुकूल तीन भव्य महल बनवाए, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

2. चार दृश्य: जीवन का मोड़सिद्धार्थ के जीवन में वास्तविक परिवर्तन तब आया जब उन्होंने महल से बाहर की यात्रा के दौरान चार दृश्य देखे:एक वृद्ध व्यक्ति: शरीर की जरावस्था का बोध।एक बीमार व्यक्ति: शारीरिक कष्ट और रोगों की पीड़ा।एक मृत देह: जीवन की नश्वरता का सत्य।एक शांत सन्यासी: दुखों से मुक्ति और शांति का मार्ग।इन दृश्यों ने राजकुमार के हृदय में झकझोर देने वाले प्रश्न खड़े कर दिए—”क्या दुख से मुक्ति का कोई मार्ग है?”

3. महाभिनिष्क्रमण: महान त्याग29 वर्ष की आयु में, जब पूरी दुनिया सो रही थी, सिद्धार्थ ने अपनी सुंदर पत्नी यशोधरा और नवजात पुत्र राहुल को छोड़कर सत्य की खोज में निकलने का निर्णय लिया। इसे बौद्ध परंपरा में ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहा जाता है। उन्होंने अपने राजसी वस्त्र त्यागे, अपने बाल काटे और एक साधारण भिक्षु का जीवन स्वीकार किया। 4. बोधगया: परम ज्ञान की प्राप्ति (संबोधि)वर्षों तक कठोर तपस्या और कई गुरुओं से शिक्षा लेने के बाद भी सिद्धार्थ को संतोष नहीं मिला। अंततः, वे बिहार के गया में निरंजना नदी के तट पर एक पीपल वृक्ष (जिसे अब बोधि वृक्ष कहा जाता है) के नीचे ध्यानमग्न हो गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की—”जब तक ज्ञान प्राप्त नहीं होगा, मैं इस आसन से नहीं उठूँगा।”वैशाख पूर्णिमा की एक रात, सिद्धार्थ के मन के सारे विकार नष्ट हो गए और उन्हें ‘परम सत्य’ का साक्षात्कार हुआ। वे अब सिद्धार्थ नहीं, बल्कि ‘बुद्ध’ (जागृत पुरुष) बन चुके थे। 5. सारनाथ: धम्मचक्र प्रवर्तनज्ञान प्राप्ति के बाद, बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी के पास सारनाथ के मृगदाव (हिरण उद्यान) में अपने पाँच पुराने साथियों को दिया। इसे ‘धम्मचक्र प्रवर्तन’ कहा जाता है। यहाँ उन्होंने जीवन के चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का सिद्धांत दिया, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं। 6. कुशीनगर: महापरिनिर्वाण45 वर्षों तक निरंतर पैदल यात्रा कर जन-जन को शांति और अहिंसा का मार्ग दिखाने के बाद, 80 वर्ष की आयु में बुद्ध कुशीनगर पहुँचे। यहाँ उन्होंने अपने शिष्यों को अंतिम संदेश दिया—”अप्प दीपो भव” (अपना दीपक स्वयं बनो)। इसी स्थान पर उन्होंने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया, यानी जन्म और मृत्यु के चक्र से पूर्ण मुक्ति। हमारे मंदिर और बुद्ध की यात्रा का संबंधहमारा प्रस्तावित मंदिर भगवान बुद्ध की इसी महान यात्रा के प्रति एक श्रद्धांजलि है। हम यहाँ:प्रवेश द्वार पर लुंबिनी के शांति प्रतीकों को उकेरेंगे।मुख्य हॉल को बोधगया की शांति के अनुरूप डिजाइन करेंगे।दीवारों पर सारनाथ से कुशीनगर तक के दृश्यों की नक्काशी करवाएंगे।

हमारे दानकर्ता हमारे बारे में क्या कहते हैं

"इस भगवान बुद्ध मंदिर में दान करना मेरे लिए एक अत्यंत संतोषजनक अनुभव रहा है। यहाँ का शांत वातावरण ध्यान के लिए बिल्कुल उपयुक्त है, और यह देखना अद्भुत है कि हमारा योगदान किस प्रकार सामाजिक कल्याण और आध्यात्मिक शिक्षाओं में सीधे काम आ रहा है। मंदिर का प्रबंधन पूरी तरह पारदर्शी और स्वागत योग्य है।"
अर्जुन प्रसाद
"इस पवित्र स्थान में योगदान देना एक सच्चे आशीर्वाद की तरह महसूस होता है। मंदिर के रख-रखाव और इसकी नेक पहलों में सहायता करने से अपार आंतरिक शांति मिलती है। आने वाली पीढ़ियों के लिए जागरूकता और बौद्ध ज्ञान के इस सुंदर आश्रय स्थल को सुरक्षित रखने में मदद करना मेरे लिए एक सौभाग्य की बात है।"
ज्वाला सिंह
"यह मंदिर वास्तव में शांति और करुणा का एक पावन केंद्र है। यहाँ के समुदाय के अविश्वसनीय समर्पण और उनके दैनिक कार्यक्रमों के सकारात्मक प्रभाव को देखने के बाद मैं दान करने के लिए प्रेरित हुआ। इस आध्यात्मिक घर को वापस देना मेरी खुद की ध्यान यात्रा को समृद्ध बनाता है।"
अनुराग अग्रवाल
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डिजाइन दर्शन (Design Philosophy)

मंदिर का पूरा नक्शा 'मंडल' (Mandala) पद्धति पर आधारित है। बौद्ध परंपरा में 'मंडल' ब्रह्मांड का प्रतीक है। जब कोई भक्त मंदिर के परिसर में प्रवेश करता है, तो उसकी यात्रा बाहरी कोलाहल से आंतरिक शांति की ओर होती है। * सादगी और भव्यता: हम 'मिनिमलिस्ट' (Minimalist) सौंदर्यशास्त्र का पालन कर रहे हैं, जो बुद्ध की शिक्षाओं की सादगी को दर्शाता है, जबकि इसकी विशालता मन में श्रद्धा भाव जगाती है। * प्रकाश और वायु: मंदिर को इस तरह डिजाइन किया गया है कि सूर्य की पहली किरणें सीधे भगवान बुद्ध के चरणों को स्पर्श करें।

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मुख्य गर्भगृह (The Sanctum Sanctorum)

मंदिर का हृदय स्थल 'गर्भगृह' होगा, जहाँ मुख्य प्रतिमा स्थापित की जाएगी। * विशाल गुंबद: गर्भगृह के ऊपर एक ऊंचा अर्धवृत्ताकार गुंबद होगा, जो आकाश की अनंतता का प्रतीक है। इसकी ऊंचाई [X] फीट होगी। * ध्वनि विज्ञान (Acoustics): गर्भगृह की छतों को इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि मंत्रों का उच्चारण करने पर एक दिव्य प्रतिध्वनि (Resonance) उत्पन्न हो, जो ध्यान में सहायक हो।

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मुख्य प्रतिमा: शांत और सौम्य स्वरूप

हमारी वेबसाइट पर आप जो HD चित्र देख रहे हैं, वैसी ही एक भव्य प्रतिमा यहाँ स्थापित होगी: * सामग्री: इस मूर्ति को राजस्थान के सफेद मकराना मार्बल या काले ग्रेनाइट (अपनी पसंद अनुसार चुनें) से तराशा जाएगा। * मुद्रा: बुद्ध को 'भूमिस्पर्श मुद्रा' (Bhumisparsha Mudra) में दिखाया जाएगा, जो उनके ज्ञान प्राप्ति और धरती को साक्षी मानने का प्रतीक है। * प्रभामंडल: मूर्ति के पीछे एक सूक्ष्म नक्काशीदार 'प्रभामंडल' (Aura) होगा, जिसमें शुद्ध सोने की परत (Gold Leafing) का कार्य किया जाएगा।

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पत्थर और नक्काशी (The Stonework)

हम भारत की श्रेष्ठ निर्माण परंपराओं का उपयोग कर रहे हैं: * लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone): मंदिर के बाहरी हिस्से में धौलपुर या जोधपुर के लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया जाएगा, जो सांची के स्तूप की याद दिलाता है। * जातक कथाएं: मंदिर की बाहरी दीवारों पर भगवान बुद्ध के पिछले जन्मों की 'जातक कथाएं' बारीकी से उकेरी जाएंगी। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक खुली किताब की तरह होगी।

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अष्टकोणीय ध्यान कक्ष (The Octagonal Meditation Hall)

मुख्य मंदिर के नीचे एक विशाल ध्यान कक्ष होगा: * क्षमता: यहाँ एक साथ 500-1000 लोग ध्यान (Vipassana) कर सकेंगे। * पिलर-लेस डिजाइन: आधुनिक इंजीनियरिंग का उपयोग करके इसे खंभों के बिना (Pillar-less) बनाया जाएगा ताकि साधकों के बीच कोई बाधा न आए।

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बोधि वाटिका और भूदृश्य (Landscaping)

मंदिर केवल एक इमारत नहीं, बल्कि एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) होगा: * पवित्र बोधि वृक्ष: परिसर के केंद्र में बोधगया से लाए गए 'बोधि वृक्ष' की एक शाखा लगाई जाएगी। * कमल के तालाब (Lotus Ponds): मुख्य प्रवेश मार्ग के दोनों ओर कमल के तालाब होंगे, जो कीचड़ में खिलने वाले कमल की तरह संसार में रहकर भी निर्लिप्त रहने की शिक्षा देंगे।

दानदाताओं के लिए विशेष विवरण (Value for Donors)

जब आप इस मंदिर के निर्माण में दान देते हैं, तो आप निम्नलिखित के निर्माण में भागीदार बनते हैं:

  1. एक पत्थर की नक्काशी (₹11,000): आपके द्वारा दान किया गया एक पत्थर सदियों तक बुद्ध की गाथा सुनाएगा।
  2. एक स्तंभ का निर्माण (₹1,01,000): जो मंदिर की छत और धर्म की ध्वजा को थामे रखेगा।
  3. संगमरमर की फर्श (₹5,000 प्रति वर्ग फुट): जिस पर चलकर हजारों लोग शांति की खोज करेंगे।

 

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